बिहार का खगड़िया जिला और बाढ़ का कहर, यह कोई नई कहानी नहीं है। हर साल मानसून आते ही कोसी और बागमती जैसी नदियाँ उफान पर होती हैं, और गाँव के गाँव जलमग्न हो जाते हैं। लेकिन इस जलप्रलय से भी ज्यादा भयावह है प्रशासन की संवेदनहीनता और ज़मीनी स्तर पर तैयारियों का खोखलापन। बोरना पंचायत से एक ऐसी ही विद्रोही तस्वीर सामने आई, जहाँ जलमग्न रास्तों और ठप पड़ी जिंदगी के बीच ग्रामीणों ने प्रशासन की नींद तोड़ने का बीड़ा उठाया।
'पंचायत करे पुकार' अभियान के बैनर तले, बोरना के युवा ग्राम एक्टिविस्ट नवल किशोर सिंह ने बाढ़ पीड़ितों की उन बुनियादी मांगों को लेकर मोर्चा खोल दिया है, जिन्हें प्रशासन ने कागज़ों में तो पूरा कर दिया होगा, लेकिन ज़मीन पर वे कहीं नज़र नहीं आ रहे। यह किसी राजनीतिक पद या सत्ता का संघर्ष नहीं है, बल्कि एक आम ग्रामीण द्वारा अपने लोगों के जीवन और हक़ को बचाने की एक बेबाक लड़ाई है।
ग्राउंड रिपोर्ट: प्रशासन की संवेदनहीनता और जनता का आक्रोश
कटी हुई पंचायत और नावों का भारी संकट: बाढ़ के समय किसी भी पंचायत के लिए सबसे पहली और अहम ज़रूरत होती है परिवहन का साधन। बोरना पंचायत के कई वार्ड इस वक्त पूरी तरह से मुख्यधारा से कट चुके हैं। रास्तों पर पानी का कब्ज़ा है और लोगों के पास आवाजाही का एकमात्र साधन 'नाव' बची है। लेकिन प्रशासन की तरफ से पर्याप्त नावें मुहैया नहीं कराई गई हैं।
हालात का जायज़ा लेते हुए और प्रशासन को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए ग्राम एक्टिविस्ट नवल किशोर सिंह स्पष्ट शब्दों में कहते हैं:
"हमारे पंचायत में बहुत सारा वार्ड में नाव नहीं मिला है। वहाँ पर नाव की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। नाव ओवरलोड चलता है, यदि नाव डूब जाता है तो उसका जिम्मेदार कौन होता है? इसलिए मैं विभाग से आग्रह कर रहा हूँ कि यहाँ जल्द से जल्द हमारे हर वार्ड में नाव की व्यवस्था की जाए, क्योंकि नाव से ही हमारा आना-जाना होता है, हमारा सारा रास्ता ब्लॉक है।"
यह बयान महज़ एक शिकायत नहीं है, बल्कि उस संभावित त्रासदी की पूर्व-चेतावनी है जो नावों के ओवरलोड होने के कारण किसी भी पल घटित हो सकती है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अकाल - भगवान भरोसे ग्रामीणों की जान: बाढ़ अपने साथ सिर्फ पानी नहीं, बल्कि जलजनित बीमारियाँ, सर्पदंश और अन्य मेडिकल इमरजेंसी भी लेकर आती है। ऐसे में बोरना पंचायत में स्वास्थ्य सुविधाओं का पूरी तरह से नदारद होना एक आपराधिक लापरवाही को दर्शाता है। गाँव के ही एक वयोवृद्ध ग्रामीण ने भीड़ के बीच से अपनी पीड़ा और डर को साझा करते हुए कहा:
"सबसे बड़ा प्रॉब्लम हम लोगों को नाव का है... उसके बाद एम्बुलेंस चाहिए। चूँकि पेशेंट को कुछ हो जाता है, वो कैसे जाएगा यहाँ से? और उसके बाद यहाँ डॉक्टर की टीम मौजूद रहे 24 घंटे।"
बुजुर्ग ग्रामीण की इस बात को बल देते हुए नवल किशोर सिंह ने प्रशासन से तत्काल प्रभाव से मेडिकल टीमों की तैनाती की मांग की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि, "इस जगह पर एक एम्बुलेंस होना चाहिए, एक डॉक्टर का टीम होना चाहिए... जिनको जो सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाया है, उनको जल्द से जल्द उपलब्ध सुविधा कराया जाए।"
वज्रपात का खौफ और NDRF की सख्त मांग: इस जन-आंदोलन में नवल के साथ अन्य ग्रामीण और 'पंचायत करे पुकार' के अध्यक्ष रूपेश कुमार ने भी प्रशासन की कमियों को उजागर किया। मूसलाधार बारिश और लगातार गिरती बिजली (वज्रपात) के खतरे को रेखांकित करते हुए उन्होंने प्रशासन के सामने स्पष्ट मांगें रखीं:
"यहाँ जो हर रोज़ बारिश हो रही है... बिजली काफी जोरों से कड़क रहा है, तो वहाँ अरेन्स्टिंग लाइट (तड़ित चालक) की जरुरत है। हमारे कुछ बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान सब पानी में तैरते हैं। इसी के लिए हम मांग करते हैं कि यहाँ NDRF की टीम भी होनी चाहिए। ये चार चीज़ अविलंब होनी चाहिए - NDRF की टीम, अरेन्स्टिंग लाइट, शौचालय निर्माण में तेजी और कल से कम्युनिटी किचन की शुरुआत।"
आँखों देखी: जहाँ ज़िंदगियाँ ओवरलोड नावों और प्रशासन की दया पर टिकी हैं
जब सिस्टम सो जाता है, तो नागरिकों को खुद अपनी पत्रकारिता और अपना नेतृत्व तय करना पड़ता है। मैं, नवल किशोर सिंह, बोरना पंचायत के बाढ़ प्रभावित इलाकों से सीधे यह दस्तावेज़ दर्ज कर रहा हूँ, ताकि आने वाले समय में कोई यह न कह सके कि जब बोरना डूब रहा था, तो हमने आवाज़ नहीं उठाई।
स्थिति यह है कि बोरना पंचायत के दर्जनों वार्ड टापू में तब्दील हो चुके हैं। हमारा रास्ता ब्लॉक है। आवाजाही का एकमात्र साधन नावें हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पंचायत के कई वार्डों में अब तक एक भी सरकारी नाव नहीं पहुँची है। लोग जान हथेली पर रखकर ओवरलोड नावों में सफर कर रहे हैं। मैंने आज प्रशासन से सीधे सवाल किया है कि अगर यह ओवरलोड नाव डूबती है, तो इसका ज़िम्मेदार कौन होगा? विभाग को अविलंब हर वार्ड में नाव की व्यवस्था करनी ही होगी।
हमारा एक और प्रमुख मुद्दा 'कम्युनिटी किचन' का है। बाढ़ पीड़ितों के लिए यह कोई खैरात नहीं, बल्कि उनका कानूनी हक़ है। लेकिन अब तक किसी भी वार्ड में कम्युनिटी किचन चालू नहीं किया गया है। मैंने आज ग्रामीणों को भी जागरूक किया कि वे प्रशासन से 'कम्युनिटी किचन' के नाम पर ही अपना हक़ मांगें, ताकि अधिकारियों को पता चले कि हम अपने अधिकारों के प्रति पूरी तरह सचेत हैं। अगर कल से कम्युनिटी किचन शुरू हो जाता है, तो हमारी एक बहुत बड़ी समस्या, यानी भूखे पेट सोने की नौबत, खत्म हो जाएगी।
हम चार स्पष्ट मांगें रख रहे हैं—हर वार्ड में नाव, 24 घंटे मेडिकल टीम और एम्बुलेंस, तत्काल कम्युनिटी किचन की शुरुआत, और NDRF की तैनाती के साथ अरेन्स्टिंग लाइट। यह कोई मांग-पत्र नहीं है, यह एक अल्टीमेटम है। बोरना की जनता अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। हम अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़क से लेकर (जो अब पानी में डूबी है) अफ़सरों के दफ्तर तक जाएंगे। यह ग्राउंड रिपोर्ट महज़ एक लेख नहीं, प्रशासन के निकम्मेपन का पुख्ता सबूत है।
बोरना की डायरी: कागज़ी नावों के भरोसे तैरता हमारा गाँव
(दिन भर की जद्दोजहद के बाद, रात के अंधेरे में नवल के आत्म-चिंतन के पन्ने)
आज दिन भर की बारिश और बाढ़ के पानी में भीगने के बाद जब रात को यह लिख रहा हूँ, तो बाहर अब भी बादलों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई है। शरीर थक चुका है, लेकिन दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा है—क्या बोरना की जनता की जान इतनी सस्ती है? आज दिन भर जो कुछ भी मैंने देखा, वह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, वह एक प्रशासनिक हत्या की तैयारी है।
कोसी और बागमती का पानी हर साल आता है, यह हम सब जानते हैं। प्रशासन भी जानता है। फिर भी, आज जब मैं पंचायत के अलग-अलग वार्डों में घूम रहा था, तो रास्ते पूरी तरह जलमग्न थे और मुख्यधारा से हमारा संपर्क कट चुका था। विडंबना देखिए कि जिस गाँव के चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी है, वहाँ आवाजाही के लिए प्रशासन ने पर्याप्त नावें तक नहीं दी हैं। जो एकाध नावें चल भी रही हैं, उन पर क्षमता से दोगुने-तिगुने लोग लदे हुए हैं। आज जब मैं नाव के पास खड़ा था, तो मुझे साफ़ दिख रहा था कि अगर यह नाव डगमगाई, तो यह सिर्फ एक हादसा नहीं होगा, बल्कि प्रशासन की लापरवाही से हुआ एक सामूहिक हत्याकांड होगा।
आज सबसे ज़्यादा पीड़ा मुझे गाँव के एक वयोवृद्ध बाबा की बात सुनकर हुई। जब मैंने उनसे पूछा कि बाबा, आपको सबसे ज़्यादा दिक़्क़त किस बात की है? तो उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, "सबसे बड़ा प्रॉब्लम नाव का है... और एम्बुलेंस चाहिए। किसी पेशेंट को कुछ हो जाए तो वो कैसे जाएगा?" एक बुजुर्ग की आँखों में अपनी जान बचाने की जो बेबसी आज मैंने देखी, वह मुझे रात भर सोने नहीं देगी। हमारे यहाँ कोई मेडिकल टीम नहीं है। 24 घंटे डॉक्टर की उपलब्धता तो दूर, एक बुनियादी एम्बुलेंस तक का इंतज़ाम नहीं है。
बाढ़ में चूल्हे बुझ जाते हैं। सरकार का नियम है कि आपदा के समय 'कम्युनिटी किचन' (सामुदायिक रसोई) शुरू होनी चाहिए। लेकिन हमारे यहाँ लोगों को खाने के लाले पड़े हैं। आज जब भीड़ में कुछ लोग 'खाने की व्यवस्था' की बात कर रहे थे, तो मुझे उन्हें बीच में रोककर समझाना पड़ा कि इसे 'कम्युनिटी किचन' कहिए। अफ़सरों को जब तक यह एहसास नहीं होगा कि गाँव के लोग अपने हक़ और सरकारी नियमों की भाषा समझने लगे हैं, तब तक वे हमें अनपढ़ समझकर टरकाते रहेंगे। सिस्टम से लड़ने के लिए सिस्टम की भाषा आनी ज़रूरी है, यह बात बोरना की जनता को सिखानी ही होगी।
मेरे साथ रूपेश कुमार और बाकी युवा भी आज डटे रहे। लगातार गिरती बिजली और मूसलाधार बारिश के बीच रूपेश ने बिल्कुल वाजिब मांग उठाई कि हमें यहाँ अरेन्स्टिंग लाइट और NDRF की टीम चाहिए। हमारे गाँव के बच्चे, बुजुर्ग पानी में तैर कर गुज़ारा कर रहे हैं। क्या हम इंसान नहीं हैं?
आज की रात भले ही अंधेरी हो और चारों तरफ बाढ़ का पानी हो, लेकिन मेरा संकल्प और दृढ़ हुआ है। बोरना की इस दुर्दशा का एक-एक हिसाब रखा जाएगा। यह कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है, यह हमारे वजूद की लड़ाई है। और जब तक पंचायत का हर एक व्यक्ति सुरक्षित नहीं हो जाता, 'पंचायत करे पुकार' की यह आवाज़ शांत नहीं होगी。