जब महिलाएं काम करें तो 'पड़ोसी' क्या कहेंगे? बोरना में सरपंच नवल किशोर सिंह का बेबाक संवाद

महिला सशक्तिकरण • सरपंच संवाद

हाल ही में बोरना पंचायत में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 5 दिवसीय 'अगरबत्ती निर्माण प्रशिक्षण' कार्यशाला का आयोजन हुआ था। इस दौरान एक बहुत ही आम, लेकिन गंभीर सामाजिक मुद्दा सामने आया— "जब महिलाएं घर से बाहर निकलकर या घर में ही कोई नया रोजगार शुरू करती हैं, तो समाज और खासकर पड़ोसी क्या कहते हैं?"

विषय: रूढ़िवादी सोच पर प्रहार वक्ता: नवल किशोर सिंह
💡 संदर्भ (Context): यह संवाद बोरना में आयोजित कौशल विकास विभाग के कार्यक्रम का हिस्सा है। इस 5 दिवसीय अगरबत्ती निर्माण प्रशिक्षण कार्यशाला की विस्तृत रिपोर्ट और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

मानसिक और सामाजिक दबाव से आज़ादी

एक सरपंच और ग्राम एक्टिविस्ट के तौर पर मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि महिलाओं को सिर्फ हुनर (Skill) देना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें उस मानसिक और सामाजिक दबाव से भी बाहर निकालना जरूरी है जो उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। इसी विषय पर मैंने प्रशिक्षण ले रही माताओं-बहनों से एक सीधा और बेबाक संवाद किया।

महिलाओं को संबोधित करते हुए सरपंच नवल किशोर सिंह
Image 1: अगरबत्ती निर्माण कार्यशाला में महिलाओं को आत्मनिर्भरता और सामाजिक चुनौतियों पर संबोधित करते हुए सरपंच नवल किशोर सिंह

"अगर हम तानें सुनेंगे, तो क्या वो हमारी आर्थिक तंगी दूर करेंगे?"

मैंने कार्यशाला में मौजूद महिलाओं से पूछा कि घर में काम करने से क्या फायदा? अक्सर लोग ताना मारते हैं कि "देखो, फलाने की बहू घर में काम कर रही है, बेटियां काम कर रही हैं।" लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि जो लोग आज ताने मार रहे हैं, वे कभी आपके बुरे वक्त में आपकी आर्थिक मदद करने नहीं आएंगे।

"अगर उनका ताना सुनकर हम काम करना छोड़ दें और हमारी आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाए, तो इसमें नुकसान किसका है? इसलिए हमें ऐसे पड़ोसियों की बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देना चाहिए।"

"वही निंदा करने वाले कल आपसे काम मांगेंगे"

शुरुआत में जब आप कोई भी अच्छा और नया काम करेंगे, तो पड़ोसी निंदा करेंगे ही। यह समाज की फितरत है। लेकिन जब आप उसी काम को पूरी लगन से करेंगी, पैसे कमाने लगेंगी, अपने बच्चे का दाखिला किसी अच्छे स्कूल में करवाएंगी, समय पर उसकी फीस भरेंगी, या अपनी बीमार सास की दवा-दारू का खर्च अपने पैसों से उठाएंगी— तब नजारा बिल्कुल बदल जाएगा।

मैंने महिलाओं को आश्वस्त किया कि, "वही पड़ोसी जो कल तक ताने मार रहे थे, वे आपकी सफलता देखकर आपके पास आएंगे और कहेंगे— 'दीदी, हमको भी सिखा दीजिए। हम भी खाली बैठे रहते हैं, हम भी आपके साथ काम करेंगे।' फिर वही आपका हाथ पकड़ेंगी और आपके साथ अगरबत्ती बनाएंगी।"

सफलता ही हर ताने का जवाब है

इसलिए मेरी सभी ग्रामीण महिलाओं से यही अपील है कि "पड़ोसी क्या कहेंगे, इस डर से अपने कदम मत रोकिए। अपने काम और अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित कीजिए।" हर अच्छे काम में लोग शुरुआत में पैर खींचते हैं, लेकिन सफलता मिलने पर वही लोग आपके पीछे खड़े होते हैं।

महिला सशक्तिकरण सिर्फ नारों से नहीं आता, यह तब आता है जब एक महिला आर्थिक रूप से मजबूत होती है और समाज की परवाह किए बिना अपने परिवार को आगे ले जाने का फैसला करती है।

पूरा संवाद यहाँ सुनें (विडियो)

इस प्रेरक संवाद का पूरा वीडियो फेसबुक पर उपलब्ध है। आप इसे नीचे दिए गए प्लेयर में सीधे सुन सकते हैं:

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mail@nksingh.in

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