
एनके सिंह ग्राम एक्टिविस्ट एवं वाल्मीकि पासवान
रिपोर्ट एवं जमीनी पड़ताल
दिनांक: 22 अगस्त 2026
स्थान: खरेता, ग्राम पंचायत मोहनपुर, प्रखंड चौथम, जिला खगड़िया
प्रस्तुतकर्ता: नवल किशोर सिंह, ग्राम एक्टिविस्ट एवं सरपंच, ग्राम कचहरी बोरना, गोगरी, खगड़िया
संगठन की चर्चा से शुरू हुआ एक जमीनी दौरा
19 अगस्त 2026 को मिनाज भारती, रूबी मैडम, धर्मेंद्र पासवान, अन्नू परवीन सहित संगठन के साथियों के साथ एक कॉन्फ्रेंस में संगठन को लेकर चर्चा चल रही थी। संगठन के नए नाम “सेना अधिकार फाउंडेशन” के पंजीकरण एवं आगे की कार्ययोजना पर बातचीत हो रही थी।
इसी बातचीत के दौरान रूबी मैडम ने बोली आप लोग आइये खरेता में कुछ महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं और वहाँ आकर स्थिति को देखना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि पहले भी एक बार खरेता जाने की योजना बनी थी, लेकिन किसी कारण से जाना संभव नहीं हो पाया था। उन्होंने दोबारा आग्रह किया कि इस बार समय निकालकर खरेता जरूर आएँ।
उस दिन समय का अभाव होने के कारण तत्काल जाना संभव नहीं हुआ। बातचीत के बाद तय हुआ कि शनिवार को सुबह 11 बजे खरेता जाकर जमीनी स्थिति देखी जाएगी।
सहरसा से लगभग 50 किलोमीटर की बाइक यात्रा।
22 अगस्त 2026 को मैं सहरसा से बाइक से खरेता के लिए निकला। लगभग 50 किलोमीटर की यात्रा करके मैं चौथम प्रखंड के करवामोर पहुँचा।
निर्धारित समय लगभग 11 बजे रखा गया था। मैं समय से कुछ पहले ही करवामोर पहुँच गया था। करीब 10 मिनट पहले ही मैं वहाँ पहुँच चुका था।
वहाँ पहुँचकर मैंने मिनाज भारती को फोन किया, लेकिन उस समय उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। कुछ ही देर बाद एम.डी. अली की ओर से फोन आया और उन्होंने पूछा कि सरपंच साहब कहाँ पहुँचे हैं। मैंने बताया अली मैं करवामोर पहुँच चुका हूँ और आप लोगों का इंतजार कर रहा हूँ। अली बोला हम लोग भी आधा घंटे में पहुंच रहा हूं।
साथियों को पहुँचने में कुछ समय लगा और लगभग 11 से 11:40 बजे के बीच साथी वहाँ पहुँचे।
लेकिन इस दौरान मेरे पास कुछ समय था, इसलिए मैंने सोचा कि चौथम प्रखंड विकास पदाधिकारी से भी मिल लिया जाए।
चौथम BDO से सार्वजनिक शौचालय के संबंध पत्रांक 120/26 दिनांक 14/7/2026 को दिया गया आवेदन पर क्या विचार किए यही पुछने
मैं चौथम प्रखंड कार्यालय पहुँचा और प्रखंड विकास पदाधिकारी रंजीत कुमार से मुलाकात की।
मैंने अपना परिचय दिया। उन्होंने सम्मानपूर्वक बैठने के लिए कहा। मैंने उनसे उस आवेदन के संबंध में जानकारी ली, जो मैंने पत्रांक 120/26 दिनांक 14/7/2026 को करवामोर के सार्वजनिक शौचालय की दयनीय स्थिति को लेकर आवेदन दिया था।
BDO साहब ने बताया कि शौचालय की स्थिति खराब है और उसे लेकर जाँच कराई गई है। उन्होंने कहा कि आगे की स्थिति देखने के बाद आवश्यकता पड़ने पर उसे स्थानांतरित करने अथवा नए निर्माण की दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।
उन्होंने एक महत्वपूर्ण सवाल किया—अगर सार्वजनिक शौचालय बन जाता है तो उसका रख-रखाव कौन करेगा?
मैंने कहा कि यदि प्रशासन निर्माण कराता है तो स्थानीय समाज उसकी साफ-सफाई और रख-रखाव की जिम्मेदारी लेने को तैयार है।
दुकानदारों ने भी रख-रखाव की जिम्मेदारी लेने की बात कही
करवामोर में आसपास के कई दुकानदारों से मैंने पहले ही इस विषय में बातचीत की थी।
दुकानदारों ने कहा कि यदि सार्वजनिक शौचालय बनता है तो वे उसके रख-रखाव में सहयोग करेंगे। जरूरत पड़ने पर सफाईकर्मी रखने के लिए दुकानदार आपस में चंदा करके खर्च उठाने को भी तैयार हैं।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहाँ आने-जाने वाले यात्रियों, महिलाओं, कोचिंग पढ़ाई करने वाले बच्चें, और परुषों के लिए सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था बेहद आवश्यक है।
मैंने प्रस्ताव रखा कि दुकानदारों और स्थानीय लोगों की एक बैठक आयोजित की जाए। बैठक में सभी लोग अपनी जिम्मेदारी तय करें और उसके बाद सामूहिक रूप से BDO को आवेदन दिया जाए कि सार्वजनिक शौचालय बनने के बाद उसके रख-रखाव की जिम्मेदारी स्थानीय लोग उठाएँगे।
दुकानदारों ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई।
यह मेरे लिए एक सकारात्मक अनुभव था कि प्रशासन के साथ-साथ समाज भी अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार है।
इसके बाद शुरू हुई खरेता की जमीनी पड़ताल
BDO से मुलाकात के बाद मैं अपने साथियों के साथ खरेता की ओर रवाना हुआ।
करवामोर से लागभग 23 किलोमीटर खरेता गांव 1.15 बजें पहुंचे। और हम लोगों ने तीन घंटा स्थानीय लोगों से मिल कर बातचीत किया।
हम लोग लगभग आठ सदस्य थे। इनमें मिनाज भारती, धर्मेंद्र पासमान, अली, अन्नू परवीन तपेंर कुमार, अमरित राज, और सोनु कुमार सहित अन्य साथी शामिल थे।
खरेता, मोहनपुर पंचायत के अंतर्गत आता है और प्रशासनिक रूप से चौथम प्रखंड का हिस्सा है।
हम जब वार्ड संख्या 12 और 13 की ओर पहुँचे और वहाँ की वास्तविक स्थिति देखनी शुरू की, तो मैं स्तब्ध रह गया।
मैंने सोचा—देश को आज़ाद हुए लगभग 79 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन क्या आज भी हमारे बिहार के किसी गाँव में लोग ऐसी परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं?
तीन-चार फीट की गलियाँ और चलना भी मुश्किल
वहाँ कई गलियाँ बेहद संकरी हैं।
कहीं लगभग तीन फीट की जगह है, कहीं चार फीट और कहीं उससे भी कम।
एक भी जगह गलियाँ पक्की नहीं हैं। दोनों तरफ घर और दीवारें हैं। कई जगह टाट अथवा अस्थायी सामग्री से बने घर दिखाई देते हैं।
मुख्य सड़क से नीचे की ओर जाते हुए रास्ता इतना कठिन है कि ठीक से चलना भी मुश्किल हो जाता है।
दिन में किसी तरह आदमी निकल जाए, लेकिन रात के समय वहाँ चलना और भी खतरनाक हो सकता है।
मैं खुद जब उस रास्ते से जा रहा था तो महसूस कर रहा था कि एक सामान्य व्यक्ति के लिए इस रास्ते से निकलना कितनी बड़ी चुनौती होगी।
ग्रामीण बाल्मीकि पासवान ने बुलाकर दिखाई अपनी बस्ती
उन्होंने बड़े उत्साह और उम्मीद के साथ कहा कि आइए सर, हमारे इलाके को देखिए और देखिए कि हम लोग किस तरह रह रहे हैं।
मैं उनके साथ आगे बढ़ा और वास्तविक स्थिति को करीब से देखने लगा।
रास्ता इतना ऊबड़-खाबड़ और संकरा था कि मेरे साथ चल रहे एक साथी का सिर एक घर के बाहर निकले छज्जे से टकरा गया।
छज्जा लगभग डेढ़-दो फीट बाहर निकला हुआ था। रास्ते की ऊँच-नीच के कारण साथी का संतुलन बिगड़ा और उसका सिर छज्जे से जा टकराया।
उसके सिर से खून निकलने लगा।
मैंने बाकी साथियों को वापस भेज दिया और घायल साथी को दवा आदि दिलाने के लिए कहा। इसके बाद मैं अकेले बाल्मीकि पासवान जी के साथ आगे गया। लेकिन बाद में सभी साथी रुवि मैडम के साथ वहां पहुंचा।
बिजली के पोल तक नहीं पहुँचे
आगे जाकर जो दृश्य मैंने देखा, वह और भी चिंताजनक था।
वहाँ नियमित रूप से बिजली के पोल और तार की व्यवस्था दिखाई नहीं दी।
एक ढाबे के आसपास से लोग निजी तौर पर तार खींचकर अपने घरों तक बिजली पहुँचा रहे थे। बीच में बाँस का खंभा लगाकर तार को सहारा दिया गया था।
बाँस को बिजली के तार के सहारे के रूप में इस्तेमाल करना किसी भी दृष्टि से स्थायी व्यवस्था नहीं मानी जा सकती।
तेज हवा, बारिश या बाँस के कमजोर होने की स्थिति में तार टूटने या दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
फिर भी लोग मजबूरी में ऐसी व्यवस्था के सहारे अपने घरों में बल्ब जलाने की कोशिश कर रहे हैं।
सवाल यह है कि यदि कोई बस्ती वर्षों से ऐसी स्थिति में रह रही है तो वहाँ स्थायी बिजली व्यवस्था क्यों नहीं पहुँची?
सबसे दर्दनाक बात—मृतक को श्मशान तक ले जाने का रास्ता नहीं
बाल्मीकि पासवान जी ने मुझे जो बात बताई, वह सुनकर मैं बेहद चिंतित हुआ।
उन्होंने बताया कि जब बस्ती में किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो शव को मुख्य सड़क तक पहुँचाना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।
कई जगह रास्ता इतना संकरा और ऊबड़-खाबड़ है कि सामान्य अर्थों में शव को चचरी या चारपाई पर लेकर निकलना संभव नहीं हो पाता।
परिवार और ग्रामीणों को शव को कंधे पर उठाकर कठिन रास्ते से मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है।
मुख्य सड़क पर पहुँचने के बाद ही चचरी आदि की व्यवस्था करके आगे शव को ले जाया जाता है।
एक इंसान की मृत्यु के बाद भी उसे सम्मानजनक तरीके से अंतिम यात्रा तक ले जाने के लिए यदि रास्ता उपलब्ध नहीं है तो यह केवल सड़क की समस्या नहीं है—यह मानव गरिमा का प्रश्न है।
प्रसव पीड़ित महिला के लिए स्थिति और भी गंभीर
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि यदि किसी महिला को प्रसव के लिए बाहर ले जाना हो तो रास्ते की खराब स्थिति के कारण उसे अस्पताल तक पहुँचाना अत्यंत कठिन हो जाता है।
चारपाई या सामान्य साधन से महिला को बाहर निकालना मुश्किल होता है।
ऐसी स्थिति में परिवार के लोगों को उसे बेहद कठिन परिस्थितियों में उठाकर या सहारा देकर बाहर लाना पड़ता है।
यह स्थिति किसी भी ग्रामीण क्षेत्र के लिए बेहद गंभीर है।
एक गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल तक पहुँचाना कई बार जीवन-मृत्यु का सवाल हो सकता है। ऐसे में सड़क और आवागमन की सुविधा का अभाव सीधे तौर पर लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।
पीएचईडी की पाइपलाइन है, लेकिन पानी की समस्या बरकरार
बस्ती में पीएचईडी की पानी की पाइपलाइन दिखाई देती है, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार पानी की आपूर्ति संतोषजनक नहीं है।
कहीं-कहीं नल से बूंद-बूंद पानी आता है, जबकि कई जगह नल बंद पड़े हैं।
यह सवाल भी सामने आता है कि यदि पाइपलाइन पहुँच चुकी है तो नियमित और पर्याप्त पेयजल आपूर्ति क्यों नहीं हो रही?
सरकार की योजना कागज पर पहुँच जाना पर्याप्त नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि उस योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक वास्तविक रूप से पहुँचे।
नदी कटाव और दूसरी समस्याएँ भी मौजूद
खरेता क्षेत्र में नदी कटाव की समस्या भी ग्रामीणों ने बताई।
ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी भी व्यक्त की।
उनका कहना था कि जनप्रतिनिधियों को नियमित रूप से क्षेत्र में आकर लोगों की समस्याओं को देखना चाहिए।
चुनाव के समय वोटर से बड़े-बड़े वादे करना और जितने के बाद वापस देखने भी नहीं आना जनता को अपने हाल पर छोड़ देना तो लोगों में नाराजगी तो रहेंगी ही।
यह नाराजगी केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति है जिसमें जनता अपनी मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए लगातार इंतजार करती रहती है।
सभी जनप्रतिनिधियों से मेरा सीधा सवाल
मैं किसी भी जनप्रतिनिधि का व्यक्तिगत विरोध नहीं करता।
लेकिन जनप्रतिनिधि का मूल कर्तव्य जनता के बीच रहना और उनकी समस्याओं को समझना है।
जिस जनता ने वोट देकर किसी को प्रतिनिधि बनाया है, उसकी बस्ती में जाकर उसकी परेशानी देखना भी जनप्रतिनिधित्व का हिस्सा है।
यदि गलियाँ इतनी खराब हैं, बिजली की व्यवस्था नहीं है, पानी की समस्या है और लोगों को शव तक मुख्य सड़क तक पहुँचाने में परेशानी होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
विकास का पैसा कहाँ खर्च हुआ?
किस काम पर खर्च हुआ?
किस स्तर का काम हुआ?
यदि काम हुआ तो आज जमीन पर उसका परिणाम क्यों नहीं दिखाई देता?
इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए।
BDO से भी कार्रवाई की अपेक्षा
मैंने चौथम प्रखंड विकास पदाधिकारी रंजीत कुमार से भी इस क्षेत्र की स्थिति के बारे में बात की है।
मेरा आग्रह है कि अधिकारी स्वयं खरेता जाकर वार्ड संख्या 12 और 13 की वास्तविक स्थिति देखें।
सिर्फ कार्यालय में बैठकर किसी क्षेत्र की विकास स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।
मैं चाहता हूँ कि वहाँ की गलियों, बिजली व्यवस्था, पेयजल, आवागमन और अन्य मूलभूत सुविधाओं की जाँच कराई जाए।
साथ ही संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों से भी पूछा जाए कि इन क्षेत्रों में अब तक कौन-कौन से विकास कार्य कराए गए हैं और उनका वर्तमान परिणाम क्या है।
मेरा अगला कदम
मैं आवेदन देकर चुप बैठ जाने वाला व्यक्ति नहीं हूँ।
मेरा मानना है कि जनता को आवेदन नहीं, काम चाहिए।
जनता को केवल आश्वासन नहीं, धरातल पर दिखाई देने वाला विकास चाहिए।
बाढ़ की स्थिति सामान्य होने के बाद मैं खरेता का दोबारा दौरा करने का प्रयास करूँगा।
मैं देखना चाहता हूँ कि 22 अगस्त को जिन समस्याओं से मैंने प्रशासन को अवगत कराया, उन पर क्या कार्रवाई हुई।
इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर मैं प्रखंड विकास पदाधिकारी को लिखित आवेदन दूँगा और उसकी प्रतिलिपि जिला पदाधिकारी, खगड़िया को भी दूँगा।
मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति को बदनाम करना नहीं है।
मेरा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिस नागरिक को संविधान ने सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार दिया है, उसे कम-से-कम सड़क, बिजली, पानी और सुरक्षित आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाएँ मिलें।
50 किलोमीटर की यात्रा और एक दिन की थकान
उस दिन मैं सहरसा से लगभग 50 किलोमीटर बाइक चलाकर खरेता पहुँचा था।
पूरे दिन साथियों के साथ पैदल घूमना, गलियों की स्थिति देखना, ग्रामीणों से बातचीत करना, उनकी समस्याएँ सुनना और प्रशासनिक अधिकारियों से बात करना—यह सब शारीरिक रूप से काफी थकाने वाला था।
शाम को लगभग 30 किलोमीटर की यात्रा करके हम अपने घर की ओर लौटे।
शरीर थक चुका था, लेकिन मन में एक सवाल लगातार चल रहा था—
क्या आज़ादी के 79 साल बाद भी किसी बस्ती को बुनियादी सुविधाओं के लिए इस तरह संघर्ष करना चाहिए?
निष्कर्ष: विकास कागज पर नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए
खरेता की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक दौरा नहीं था।
यह एक सवाल है।
यह सवाल प्रशासन से भी है, पंचायत प्रतिनिधियों से भी है और हम सभी से भी है।
सरकारी योजनाएँ बनती हैं, बजट आता है, योजनाएँ स्वीकृत होती हैं और कागज पर विकास का रिकॉर्ड भी तैयार होता है।
लेकिन असली विकास तब माना जाएगा जब—
- गाँव की गलियाँ चलने लायक हों।
- बिजली के लिए अस्थायी बाँस के खंभे पर निर्भरता खत्म हो।
- हर घर तक सुरक्षित बिजली पहुँचे।
- पीने का पानी नियमित मिले।
- बीमार और गर्भवती महिलाओं को आसानी से मुख्य सड़क तक पहुँचाया जा सके।
- किसी मृत व्यक्ति को अंतिम यात्रा के लिए सम्मानजनक रास्ता मिल सके।
- नदी कटाव से प्रभावित लोगों की समस्या का समाधान हो।
- ग्रामीणों को अपने ही गाँव में मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े।
मेरा स्पष्ट मानना है—जनता को काम चाहिए, केवल आवेदन नहीं। जनता को परिणाम चाहिए, केवल आश्वासन नहीं।
मैं आगे भी खरेता की स्थिति पर नजर रखूँगा और यह देखने का प्रयास करूँगा कि प्रशासन इस जमीनी स्थिति पर क्या कदम उठाता है।
अगर काम होगा तो उसका स्वागत होगा।
अगर काम नहीं होगा तो जनता की आवाज को प्रशासन और सरकार तक पहुँचाना हमारा लोकतांत्रिक दायित्व है।
समाधान नहीं तो आवाज उठाती रहेगी ।
जय हिंद।
एनके सिंह
ग्राम एक्टिविस्ट सरपंच
ग्राम कचहरी बोरना गोगरी खगड़िया बिहार