एक छात्रा की आवाज, मुख्यमंत्री का जवाब और ग्राम स्तर से उठता सवाल — जवाबदेही कहाँ है?
12 अगस्त 2026 की सुबह जब मैंने अपना फोन खोला और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर स्क्रॉल किया, तो रणविजय सिंह (@ranvijaylive) का एक ट्वीट मेरी नजरों में आ गया। रणविजय सिंह एक पत्रकार हैं और यूपी से जुड़े माने जाते हैं। उनके ट्वीट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के एक कार्यक्रम का वीडियो था।
ट्वीट का मूल पाठ इस प्रकार है:
छात्रा: मैं ताइक्वांडो की नेशनल खिलाड़ी हूं. मेरा इंटरनेशनल के लिए सलेक्शन हुआ, लेकिन मुझसे 1.5 लाख रुपए मांगे गए. इसलिए मैं इंटरनेशनल नहीं खेल पाई.
मुख्यमंत्री पुस्कर धामी: चलो बेटा अभी बैठ जाओ, कोई बात नहीं.
सोचिए BJP की सरकार में किस लेवल का भ्रष्टाचार है. ये लाइव अब हर जगह से हटा दिया गया है.
10 अगस्त 2026 को उत्तराखंड सरकार ने 'मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन' किया. मुख्यमंत्री पुस्कर धामी बच्चों से बात कर रहे थे, तभी इस बच्ची ने भ्रष्टाचार का मामला सामने रख दिया. पहले ये कार्यक्रम BJP उत्तराखंड के पेज और सरकार के Uttarakhand DIPR और सरकार से जुड़े तमाम पेज पर लाइव था. अब हर जगह से डिलीट हो गया है.
यह ट्वीट पढ़ते ही मेरे अंदर कुछ हिल गया। एक छोटी सी छात्रा मुख्यमंत्री के सामने खड़ी होकर अपनी पीड़ा बता रही है, और जवाब में “बैठ जाओ बेटा, कोई बात नहीं” सुन रही है। एक ग्राम स्तर का आदमी होने के नाते, जिसने पिछले कई सालों से भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, यह दृश्य मुझे अंदर तक व्यथित कर गया।
मैं सिर्फ ट्वीट पर भरोसा करके बैठने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। एक्स से जानकारी मिलती है, देश-विदेश की खबरें आती हैं, लेकिन हर महत्वपूर्ण दावे की स्वतंत्र समीक्षा जरूरी होती है। इसलिए मैंने उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, छात्रा के बाद के बयान और सार्वजनिक कवरेज को ध्यान से देखा। फिलहाल जो तथ्य मेरे सामने आए, वे इस प्रकार हैं:
- घटना कब और कहाँ हुई: 10 अगस्त 2026 को देहरादून में मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ कार्यक्रम में।
- छात्रा कौन है: देहरादून के CNI गर्ल्स स्कूल की कक्षा 12 की छात्रा सयारा (Sahra/Sayara)। वह ताइक्वांडो में राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल विजेता हैं। जम्मू में हुई नेशनल प्रतियोगिता में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया था।
- मूल आरोप: कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल चयन होने के बावजूद उनसे 1.5 लाख रुपये मांगे गए, इसलिए वे नहीं जा सकीं। वे भावुक हो गईं।
- मुख्यमंत्री का तत्काल जवाब: “चलो बेटा अभी बैठ जाओ, कोई बात नहीं।” इसके बाद उन्होंने अधिकारियों को छात्रा के स्कूल की जानकारी नोट करने और मामले को देखने के निर्देश दिए। कुछ रिपोर्टों में रिपोर्ट तलब करने की बात भी आई।
- छात्रा का बाद का स्पष्टीकरण (सबसे महत्वपूर्ण): सयारा ने एक अलग वीडियो में बताया कि रोमानिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए कुल खर्च लगभग 3.70 लाख रुपये बताया गया था। आयोजक/काउंसिल की तरफ से 1.70 लाख रुपये की सहायता दी जानी थी। बाकी लगभग 1.50 लाख रुपये उन्हें खुद जुटाने थे। यह रिश्वत या चयन के बदले घूस नहीं था, बल्कि टूर्नामेंट के खर्च में खिलाड़ी का हिस्सा (self-funded portion) था। वे इसे जुटा नहीं पाईं और स्कूल आदि को पूरी बात समय पर नहीं बता सकीं।
- लाइव प्रसारण: मूल ट्वीट में दावा किया गया कि कार्यक्रम का लाइव बीजेपी उत्तराखंड, यूके डीआईपीआर और अन्य सरकारी पेजों से हटा दिया गया। यह दावा कई जगह दोहराया गया, लेकिन इसकी पूरी आधिकारिक पुष्टि अभी सीमित है।
- अन्य महत्वपूर्ण बात: चयन आधिकारिक राज्य ताइक्वांडो एसोसिएशन के बजाय एक निजी काउंसिल/संस्था के माध्यम से लगता है। खेलों में युवा खिलाड़ियों को अक्सर खर्च का बड़ा हिस्सा खुद उठाना पड़ता है — यह एक पुरानी और व्यापक समस्या है।
अब बात सिर्फ तथ्यों की नहीं, बल्कि उन तथ्यों से उपजने वाले सवालों की है।
मैं नवल किशोर सिंह, खगड़िया जिले के बौरना पंचायत का सरपंच हूँ। पिछले पाँच साल से सरपंच के रूप में और उससे पहले करीब आठ साल से ग्राम एक्टिविस्ट के रूप में लोगों के हक-हुकूक और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा हूँ। गाँव में जब कोई गरीब व्यक्ति किसी अधिकारी या नेता के सामने अपनी पीड़ा रखता है और जवाब में “बैठ जाओ, कोई बात नहीं” सुनता है, तो वह अनुभव मुझे अच्छी तरह याद है। इसलिए यह घटना मुझे सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं लगती।
एक संवेदनशील मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि से क्या उम्मीद की जाती है?
- जब कोई बच्ची आँखों में आँसू लिए खड़ी होकर अपनी कहानी सुना रही हो, तो पहला काम उसे बीच में काटना नहीं, बल्कि पूरा सुनना होना चाहिए।
- “बैठ जाओ बेटा, कोई बात नहीं” — यह वाक्य कई लोगों को ठंडा और टालने वाला लगा। एक संवेदनशील नेतृत्व में अपेक्षित था कि वे तुरंत कहें — “बेटा, विस्तार से बताओ। हम इसकी तुरंत जाँच करवाएँगे। तुम्हारा चयन कैसे हुआ, खर्च का ब्यौरा क्या है, कौन संस्था है — सब बताओ।”
- बाद में स्कूल की डिटेल नोट कराने और देखने के निर्देश दिए गए — यह अच्छा है। लेकिन पहली प्रतिक्रिया ही लोगों के मन में छवि बनाती है। जवाबदेही सिर्फ बाद की कार्रवाई से नहीं, बल्कि उस पल की संवेदनशीलता से भी दिखती है।
मैं हमेशा यह मानता आया हूँ कि सत्ता में बैठे व्यक्ति को जवाबदेह होना चाहिए — चाहे मामला कितना भी छोटा क्यों न लगे। अगर बाद में पता चलता है कि यह रिश्वत नहीं बल्कि खर्च का हिस्सा था, तब भी सवाल बाकी रह जाता है:
- क्या राज्य सरकार युवा खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में आर्थिक सहयोग की कोई स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था बना रही है?
- निजी संस्थाओं के माध्यम से चयन होने पर भी क्या राज्य का कोई दायित्व नहीं बनता?
- एक राष्ट्रीय स्तर की गोल्ड मेडलिस्ट छात्रा को सिर्फ इसलिए अवसर गंवाना पड़े कि 1.5 लाख रुपये नहीं जुट सके — यह व्यवस्था की कमी है या नहीं?
गाँव में रहने वाला व्यक्ति जब देखता है कि मुख्यमंत्री स्तर पर एक बच्ची की आवाज को इस तरह सुना जा रहा है, तो उसे अपने आसपास के अनुभव याद आ जाते हैं। बौरना पंचायत में भी मैंने देखा है कि जब कोई गरीब महिला या युवक अपनी समस्या लेकर आता है, तो अक्सर पहला जवाब टालमटोल का होता है। मैंने हमेशा कोशिश की है कि कम से कम सुनूँ, नोट करूँ और जवाब दूँ। यही अपेक्षा मैं राज्य के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि से भी रखता हूँ।
यह घटना मुझे इसलिए और अधिक व्यथित करती है क्योंकि मैं पिछले कई सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा हूँ। ट्वीट ने सिर्फ एक वीडियो नहीं दिखाया — उसने एक मानसिकता दिखाई। और मानसिकता ही असल मुद्दा है।
मैं न तो किसी पार्टी का प्रचारक हूँ, न किसी का विरोधी। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि जवाबदेही दिखानी पड़ती है। तथ्यों की पूरी जांच के बाद भी एक बात साफ है — एक छात्रा ने साहस दिखाकर अपनी बात रखी। मुख्यमंत्री की पहली प्रतिक्रिया संवेदनशीलता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। बाद के निर्देशों का स्वागत है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि आगे क्या कार्रवाई होती है और क्या व्यवस्था में सुधार आता है。
देश के गाँवों से लेकर राज्य की राजधानी तक, जब कोई कमजोर आवाज बोलती है, तो सत्ता को पूरी तरह सुनना चाहिए। “बैठ जाओ” कहने से पहले “बोलो, हम सुन रहे हैं” कहना चाहिए।