उखड़ी दीवारें और मिसाइल मैन के सपने: डॉ. कलाम जयंती पर एक डिजिटल सरपंच की डायरी (15 अक्टूबर 2022)

सरपंच की डायरी (Op-Ed)

"मैं नवल किशोर सिंह हूँ, और आज मैं आपको सिर्फ एक कार्यक्रम की नहीं, बल्कि अपने गाँव की उस नंगी हकीकत की तस्वीरें दिखा रहा हूँ, जो फाइलों में हमेशा 'आदर्श' बतायी जाती है।"

बात दो दिन पहले, 15 अक्टूबर 2022 की है। पूरा देश 'मिसाइल मैन' डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती मना रहा था। इसी कड़ी में, मैं अपने रणनीतिक सलाहकार मिनहाज भारती, ज़मीनी साथी विक्रम जी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले आरटीआई (RTI) एक्टिविस्ट ज़ाहिर आलम (ज़ाहिर हिंदुस्तानी) के साथ बोरना पंचायत के 'मध्य विद्यालय बड़ी बोरना' पहुँचा था। 'आम आदमी करे पुकार' संगठन के बैनर तले हमने बच्चों को कॉपी-कलम बांटे।

कल (16 अक्टूबर) अखबारों ने भी हमारे इस प्रयास को प्रमुखता से छापा। मीडिया की सुर्खियां अपनी जगह हैं, लेकिन आज जब वह शोर शांत हो गया है और मैं उन तस्वीरों को दोबारा देख रहा हूँ, तो मेरे ज़हन में कई ऐसे सवाल उठ रहे हैं जो एक जनप्रतिनिधि होने के नाते मुझे सोने नहीं देते।

नवल किशोर सिंह जर्जर स्कूल भवन के सामने बच्चों को कॉपी बांटते हुए
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तस्वीर 1: जब मैं इन बच्चों के हाथों में कॉपी सौंप रहा था, तो मेरे पीछे का वो घुप अंधेरा और बेरंग ढांचा मुझे अंदर तक चुभ रहा था। कलाम साहब ने बच्चों को आसमान छूने के सपने दिए थे, लेकिन क्या ऐसे सीलन भरे माहौल में उनके सपने दम नहीं तोड़ देंगे?

प्लास्टर का फरेब और घटिया 'स्टैंडर्ड'

अक्सर जब हम सरकारी इमारतों की बात करते हैं, तो लोग कहते हैं कि "कम से कम दीवार पर प्लास्टर तो है!" हाँ, इन तस्वीरों में आपको प्लास्टर ज़रूर दिख जाएगा। लेकिन सवाल उस प्लास्टर की मौजूदगी का नहीं, उसकी 'क्वालिटी' और 'स्टैंडर्ड' का है।

खगड़िया में शिक्षा अभियान, सीलन भरी छत के नीचे सामग्री वितरण
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तस्वीर 2: इस तस्वीर में मेरे पीछे की दीवार को गौर से देखिए। प्लास्टर के नाम पर घटिया सीमेंट की लिपाई, जगह-जगह से उखड़ती परतें, और छत के कोनों पर जमा हरापन (Algae) और सीलन। क्या यही हमारे पंचायत के बुनियादी ढांचे का असली 'स्टैंडर्ड' है?

लाखों का फंड और विकास की ज़मीनी हकीकत

एक जनप्रतिनिधि के तौर पर मैं जानता हूँ कि साल 2022-23 के इस वित्तीय वर्ष में, 15वें वित्त आयोग (15th Finance Commission) और छठे राज्य वित्त आयोग (6th SFC) के तहत बिहार की हर पंचायत को 'टाइड' (Tied) और 'अनटाइड' (Untied) फंड के रूप में लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित किए गए हैं। इन पैसों का मुख्य उद्देश्य ही गांवों में पंचायत सरकार भवन, सामुदायिक केंद्र, और स्कूलों का कायाकल्प करना है।

अगर यह पैसा पूरी ईमानदारी और सही विज़न के साथ ज़मीन पर उतरे, तो मामूली खर्च में मोह में भी एक ऐसा 'हाई-क्लास' सामुदायिक भवन बन सकता है, जिसमें आधुनिक लाइटिंग हो, साफ़-सुथरे फर्श हों, और बच्चों के लिए हर तरह की साज-सज्जा हो। लेकिन ऊपर दी गई तस्वीरें चीख-चीख कर पूछ रही हैं कि आखिर यह फंड जाता कहाँ है?

क्या ऐसी पीली, दागदार और उदास दीवारों के बीच बैठकर हमारे बच्चे पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के सपने देख पाते होंगे?

बच्चों का मनोविज्ञान (Psychology) और 'कलम की ताकत'

हम अक्सर बच्चों के रिज़ल्ट को कोसते हैं, लेकिन उनके 'मनोविज्ञान' (Psychology) को नहीं समझते। जब एक बच्चा रोज़ इस तरह की खुरदरी, बदरंग और जर्जर दीवारों के साये में बैठता है, तो उसके अवचेतन मन में एक निराशा घर कर जाती है।

टीम बोरना पंचायत के स्कूल में बच्चों को संबोधित करते हुए
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तस्वीर 3: कार्यक्रम का संचालन कर रहे रूपेश के पीछे खड़े मासूम चेहरों को देखिए। वहीं बाईं ओर सफेद कुर्ते और लुंगी में आरटीआई (RTI) एक्टिविस्ट ज़ाहिर हिंदुस्तानी भी पूरी सादगी से डटे हैं, जो भ्रष्ट सिस्टम से लगातार 'कलम की लड़ाई' लड़ रहे हैं। एक साफ़ और सकारात्मक माहौल बच्चों के विकास का पहला कदम होता है, जिसे इस जर्जर सिस्टम ने उनसे छीन लिया है।

लड़ाई अभी बाकी है...

डॉ. कलाम साहब ने कहा था कि "सपने वो नहीं जो हम सोते हुए देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।" बोरना पंचायत की यह ज़मीनी हकीकत मुझे सोने नहीं देती।

मध्य विद्यालय बड़ी बोरना में उपस्थित टीम और पीछे लिखी हुई दीवार
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तस्वीर 4: हमारे पीछे की दीवार पर सफेद रंग से कुछ सरकारी 'जाँच' या 'योजना' की बातें लिखी हुई हैं, जो अब धुंधली पड़ चुकी हैं। यह मिटती हुई लिखावट ही इस सिस्टम की असली सच्चाई है।

'आम आदमी करे पुकार' संगठन का यह प्रयास सिर्फ बच्चों को सामग्री बांटने तक सीमित नहीं था। मिनहाज भारती के उस स्पष्ट विज़न, ज़ाहिर हिंदुस्तानी की बेबाकी और हमारे ज़मीनी संघर्ष का यह सिर्फ एक पड़ाव है। जब तक खगड़िया के हर स्कूल, हर सामुदायिक भवन की तस्वीर नहीं बदल जाती, तब तक नवल किशोर सिंह की यह लड़ाई शांत नहीं होगी।

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