12 दिन की भूख, 7 साल का इंतज़ार... और आज भी उन मासूम चीखों की गूंज मेरे दिल में है


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मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड: यह केवल एक आंदोलन नहीं था, यह मेरी अंतरात्मा की पुकार थी

लेखक: नवल किशोर सिंह
तत्कालीन जिला अध्यक्ष, आम आदमी पार्टी, खगड़िया


2 अगस्त 2026।

सुबह की पहली चाय अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मेरी नज़र अखबार की एक सुर्खी पर टिक गई—

"पूर्व मंत्री मंजू वर्मा और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा को सात-सात वर्ष की सजा।"

कुछ क्षणों के लिए समय जैसे थम गया।

मेरे हाथों में अखबार था...

लेकिन मेरी आंखों के सामने कोई खबर नहीं थी।

मेरी आंखों के सामने 25 फरवरी 2019 का वह दिन था, जब हमने न्याय की उम्मीद लेकर 12 दिनों के आमरण अनशन की शुरुआत की थी।

आज सात साल बाद अदालत का फैसला आया, लेकिन सच कहूँ तो मेरे मन में जीत का कोई उत्सव नहीं था।

क्योंकि कोई भी फैसला उन मासूम बच्चियों का बचपन वापस नहीं ला सकता।


उस दिन मैंने पहली बार महसूस किया कि इंसानियत भी रो सकती है...




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जब मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की खबरें सामने आईं, तो ऐसा लगा जैसे पूरा बिहार शर्म से सिर झुकाए खड़ा हो।

वे बच्चियाँ...

जिन्हें सरकार की छत के नीचे सुरक्षा मिलनी चाहिए थी...

वे अपनी ही सुरक्षा व्यवस्था में असुरक्षित थीं।

उनकी उम्र खेलने की थी...

वे डरना सीख रही थीं।

उनकी आंखों में सपने होने चाहिए थे...

लेकिन वहां केवल भय, सन्नाटा और असहनीय पीड़ा थी।

एक पिता जब अपनी बेटी को स्कूल छोड़ता है, तो उसे विश्वास होता है कि समाज उसकी रक्षा करेगा।

लेकिन उस घटना ने हर पिता से यह विश्वास छीन लिया।

उस रात मैंने खुद से पूछा—

"यदि आज भी हम चुप रहे, तो कल हम अपनी आने वाली पीढ़ी की आंखों में देखकर क्या जवाब देंगे?"

उसी रात मैंने तय कर लिया—

अब चुप नहीं बैठूंगा।


25 फरवरी 2019... जब हमने भूख को अपनी आवाज़ बना लिया




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आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्री शत्रुघ्न साहू के नेतृत्व में मैं नवल किशोर सिंह, मेरी साथी ज्योतिमाला जी और अधीर कर्ण जी आमरण अनशन पर बैठ गए।

हमारे पास कोई बड़ी गाड़ी नहीं थी।

कोई सरकारी सुरक्षा नहीं थी।

कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं थी।

हमारे पास केवल तीन चीजें थीं—

सच...

संवेदना...

और न्याय की उम्मीद...

हमने मांग की कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करें, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो और सत्ता यह संदेश दे कि बिहार की बेटियाँ केवल आंकड़े नहीं, बल्कि इस राज्य का भविष्य हैं।


12 दिन... जो शायद मेरी जिंदगी के सबसे कठिन दिन थे




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पहले दिन लोगों ने कहा—

"दो दिन में उठ जाएंगे।"

तीसरे दिन लोगों ने कहा—

"इससे क्या बदल जाएगा?"

सातवें दिन डॉक्टरों ने कहा—

"अब शरीर जवाब देने लगा है।"

दसवें दिन मेरे कदम लड़खड़ाने लगे।

लेकिन हर बार जब कमजोरी महसूस होती, मेरे मन में एक ही तस्वीर आती—

उन बच्चियों की...

जिनकी कोई गलती नहीं थी।

फिर मैं खुद से कहता—

"अगर वे इतने बड़े दर्द को सह सकती हैं, तो मैं न्याय के लिए कुछ दिन भूखा क्यों नहीं रह सकता?"

यही सोच मुझे बारहवें दिन तक बैठाए रही।


मंजू वर्मा का नाम, सत्ता की जिम्मेदारी और न्याय की उम्मीद

उस समय पूरे देश में तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा का नाम चर्चा में था। उन्होंने बाद में मंत्री पद से इस्तीफा दिया। वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया चलती रही।

आज अदालत ने मंजू वर्मा और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा को सात-सात वर्ष की सजा सुनाई है।

अदालत का यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

लेकिन मेरे लिए यह फैसला केवल दो लोगों की सजा की खबर नहीं है।

यह उन लाखों लोगों की उम्मीद का प्रतीक है, जिन्होंने कहा था—

"अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, कानून उससे बड़ा होता है।"


आज भी एक सवाल मेरा पीछा करता है...

जब भी किसी छोटी बच्ची को स्कूल जाते देखता हूँ...

जब भी किसी पिता को अपनी बेटी का हाथ पकड़कर चलते देखता हूँ...

मेरे मन में एक सवाल उठता है—

क्या हमने ऐसा समाज बनाया है, जहाँ हर बच्ची बिना डर के जी सके?

यदि इसका जवाब "नहीं" है...

तो समझिए हमारी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।


मैं राजनीति नहीं, इंसानियत के पक्ष में खड़ा था

बहुत लोगों ने पूछा—

"इस अनशन से तुम्हें क्या मिलेगा?"

मैंने मुस्कुराकर कहा—

"अगर एक भी बच्ची सुरक्षित भविष्य पाएगी, तो वही मेरी सबसे बड़ी जीत होगी।"

संघर्ष कभी पद पाने के लिए नहीं होना चाहिए।

संघर्ष उन लोगों के लिए होना चाहिए, जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।


आज मेरा सिर झुका नहीं, बल्कि और जिम्मेदार हो गया है

आज अदालत का फैसला पढ़कर मुझे संतोष मिला...

लेकिन खुशी नहीं।

क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सजा नहीं है।

न्याय का अर्थ है—

किसी और बच्ची के साथ फिर कभी ऐसा न हो।


अंतिम शब्द

इतिहास नेताओं के भाषणों से नहीं बदलता।

इतिहास बदलता है उन लोगों से, जो दूसरों के दर्द को अपना दर्द मान लेते हैं।

यदि मेरी 12 दिनों की भूख ने उन मासूम बच्चियों के न्याय की लड़ाई में एक छोटी-सी भी आवाज़ जोड़ी है, तो यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।

उन बच्चियों के नाम... जिनका बचपन छीन लिया गया।

उन माता-पिता के नाम... जिनकी आंखों में आज भी दर्द बसता है।

और उस न्याय के नाम... जिसकी राह लंबी हो सकती है, लेकिन जो एक दिन दरवाज़ा ज़रूर खटखटाता है।


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