बिहार सरकार से हमारी मांगे अनुदान नहीं, अधिकार चाहिए — सामुदायिक किचन और प्लास्टिक नहीं, स्थायी वाटरवे बांध चाहिए


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एनके सिंह ग्राम एक्टिविस्ट सरपंच बोरना गोगरी 

हर साल बाढ़ आती है, हर साल जनता का जीवन अस्त-व्यस्त होता है और हर साल राहत के नाम पर सरकार तथा प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन खर्च करना पड़ता है। सामुदायिक किचन चलाए जाते हैं, प्लास्टिक शीट बांटी जाती है, हर साल नया शौचालय बनाया जाता है पीने के पानी की व्यवस्था की जाती है, नाव लगाई जाती है और जरूरतमंद परिवारों को सहायता राशि दी जाती है। यह सब आपदा के समय आवश्यक राहत है, लेकिन क्या हर साल यही व्यवस्था हमारा स्थायी समाधान हो सकती है?

मेरा स्पष्ट कहना है—जनता को केवल अनुदान नहीं, अपना अधिकार चाहिए। राहत नहीं, स्थायी समाधान चाहिए।

गोगरी प्रखंड के बोरना, झीकटिया, बन्नी और गोगरी सहित आसपास के क्षेत्रों में हर वर्ष बाढ़ का संकट गंभीर रूप लेता है। बाढ़ आने से स्कूलों में पानी हो जाता है और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, घरों में पानी घुसता है, सड़कों और संपर्क मार्गों का आवागमन बाधित होता है, पशुओं के लिए चारा और सुरक्षित स्थान की समस्या खड़ी होती है तथा सामान्य जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है।

ऐसे समय में सरकार की ओर से सामुदायिक किचन, प्लास्टिक शीट, नाव, पेयजल, शौचालय और सहायता राशि जैसी व्यवस्थाएं की जाती हैं। प्रशासन अपनी क्षमता के अनुसार राहत पहुंचाता है, लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि हर साल राहत देने की मजबूरी क्यों बनती है?


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बरुणा मध्य विद्यालय बोरना गोगरी खगड़िया 

हमारी मांग राहत के खिलाफ नहीं
 राहत पर निर्भरता के खिलाफ है

हम सामुदायिक किचन का विरोध नहीं कर रहे हैं। बाढ़ के समय भूखे लोगों को भोजन मिलना जरूरी है। प्लास्टिक शीट की जरूरत भी है। सहायता राशि भी संकट के समय परिवारों के लिए सहारा बनती है।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हर साल उसी समस्या के सामने खड़े होकर फिर से वही सहायता देना सही रास्ता है?

जब एक इलाके को हर वर्ष बाढ़ घेरती है, तो वहां स्थायी बाढ़-नियंत्रण संरचना पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए। सरकार यदि आज राहत पर खर्च होने वाले बड़े संसाधनों का एक हिस्सा स्थायी समाधान पर लगाए, तो आने वाले वर्षों में हजारों परिवारों को बार-बार विस्थापन और संकट से बचाया जा सकता है।


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चार पंचायतों के लिए एक स्थायी समाधान

हमारी मांगे है कि रिंग बांध को केवल सामान्य तटबंध के रूप में देखने के बजाय उसे वैज्ञानिक एवं स्थायी “वाटरवे बांध” के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जाए।

ऐसा समाधान तैयार किया जाए जिससे बाढ़ के पानी के अनियंत्रित फैलाव को रोका जा सके और जल के प्रवाह को उचित दिशा में नियंत्रित किया जा सके।

बोरना, झीकटिया, बन्नी और गोगरी जैसी प्रभावित पंचायतों को ध्यान में रखकर यदि एक समग्र बाढ़-नियंत्रण योजना बनाई जाती है, तो इसका लाभ केवल एक पंचायत या एक गांव को नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की बड़ी आबादी को मिल सकता है।

हमारा मानना है कि समस्या का स्थायी समाधान केवल राहत वितरण में नहीं, बल्कि पानी के रास्ते और बाढ़ के फैलाव को नियंत्रित करने वाली मजबूत संरचना तैयार करने में है।

सरकार के खर्च का भी होगा समाधान

आज बाढ़ आने के बाद सरकार को कई स्तरों पर खर्च करना पड़ता है—सामुदायिक किचन, नाव, प्लास्टिक शीट, पेयजल, स्वच्छता, शौचालय राहत सामग्री और सहायता राशि।

हर वर्ष यह खर्च दोहराया जाता है।

यदि सरकार एक बार वैज्ञानिक सर्वेक्षण, विस्तृत परियोजना और मजबूत बाढ़-नियंत्रण संरचना पर गंभीर निवेश करती है, तो आने वाले वर्षों में राहत पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है।

यानी स्थायी समाधान जनता के लिए सुरक्षा और सरकार के लिए दीर्घकालीन आर्थिक बचत—दोनों का रास्ता बन सकता है।

जनता के साथ-साथ पशुओं की भी सुरक्षा जरूरी

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एनके सिंह ग्राम एक्टिविस्ट सरपंच बोरना गोगरी 

बाढ़ केवल इंसानों की समस्या नहीं है। हमारे ग्रामीण क्षेत्र में परिवारों की अर्थव्यवस्था खेती और पशुपालन से जुड़ी होती है। बाढ़ के समय पशुओं के लिए चारा, पानी, रहने की जगह और सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बन जाती है।

कई परिवार अपने घर से पहले अपने पशुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की चिंता करते हैं।

इसलिए बाढ़ नियंत्रण की किसी भी स्थायी योजना को केवल आबादी बचाने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उसमें मानव जीवन, पशुधन, कृषि भूमि, सड़क, विद्यालय और गांव की मूलभूत संरचनाओं की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए।

बच्चों की शिक्षा क्यों हर साल बाढ़ में डूबती है ?

बाढ़ का सबसे गंभीर प्रभाव हमारी नई पीढ़ी पर पड़ता है।

जब विद्यालय परिसर और आसपास का क्षेत्र पानी में डूब जाता है, तो बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है। सरकारी विद्यालयों की इमारतें, रास्ते और शैक्षणिक वातावरण प्रभावित होते हैं।

क्या हम हर साल अपने बच्चों को यही संदेश देना चाहते हैं कि बाढ़ आएगी तो स्कूल बंद होगा?

नहीं।

हमें ऐसा स्थायी समाधान चाहिए जिसमें हमारे बच्चे बिना डर और बिना रुकावट के अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।

सरकार से विनम्र लेकिन स्पष्ट आग्रह

मैं बिहार सरकार और संबंधित विभागों से आग्रह करता हूं कि इस मुद्दे को केवल इस वर्ष की बाढ़ की समस्या के रूप में न देखा जाए।

यह कई वर्षों से चली आ रही समस्या है और इसका समाधान भी कई वर्षों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।

बोरना, झीकटिया, बन्नी और गोगरी पंचायतों के लिए एक विशेष बाढ़-नियंत्रण एवं वाटरवे योजना तैयार की जाए।

क्षेत्र का तकनीकी सर्वेक्षण कराया जाए। जल प्रवाह, नदी के पुराने मार्ग, बाढ़ के फैलाव, तटबंधों की स्थिति और प्रभावित आबादी का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। इसके बाद ऐसी स्थायी संरचना विकसित की जाए जो भविष्य में बाढ़ के प्रभाव को न्यूनतम कर सके।

हम चाहते हैं कि विशेषज्ञों और जल संसाधन विभाग के अभियंताओं की टीम मौके पर आकर स्थिति को देखे और स्थानीय लोगों की बात भी सुने।

क्योंकि जो लोग हर साल बाढ़ झेलते हैं, वे पानी के रास्ते और समस्या की गंभीरता को जमीन पर सबसे अच्छी तरह जानते हैं।

हमारा नारा स्पष्ट है

अनुदान नहीं, अधिकार चाहिए।
समस्या नहीं, स्थायी समाधान चाहिए।
सामुदायिक किचन और प्लास्टिक की मजबूरी नहीं, सुरक्षित गांव चाहिए।
हर साल सहायता राशि नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए कि सहायता की जरूरत ही न पड़े।
बाढ़ के बाद राहत नहीं, बाढ़ से पहले स्थायी सुरक्षा चाहिए।

हम सरकार से कोई असंभव मांग नहीं कर रहे हैं। हम केवल यह चाहते हैं कि जिस धन का उपयोग हर वर्ष राहत में किया जाता है, उसका एक हिस्सा ऐसी योजना में लगाया जाए जिससे आने वाली पीढ़ियों को बार-बार वही संकट न झेलना पड़े।

अगर एक मजबूत, वैज्ञानिक और प्रभावी वाटरवे बांध व्यवस्था इन चार पंचायतों की बड़ी आबादी को बाढ़ के संकट से बचा सकती है, तो इस दिशा में गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

यह केवल बोरना की मांग नहीं है।

यह केवल झीकटिया की मांग नहीं है।

यह केवल बन्नी या गोगरी की मांग नहीं है।

यह उस पूरी ग्रामीण जनता की मांग है जो हर वर्ष बाढ़ के सामने बेबस हो जाती है।

आज आवश्यकता है कि हम राहत की राजनीति से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की नीति की ओर जाएं।

सरकार से हमारी अपील है कि इस मांग को गंभीरता से लेते हुए विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, स्थल निरीक्षण कराया जाए और चारों पंचायतों को बाढ़ से स्थायी सुरक्षा देने के लिए ठोस परियोजना तैयार की जाए।

क्योंकि जनता को बार-बार डूबने के बाद राहत नहीं चाहिए।

जनता चाहती है कि उसे डूबने से पहले ही सुरक्षित कर दिया जाए।

और यही हमारा सबसे बड़ा प्रश्न है—

“हर साल बाढ़ में करोड़ों खर्च करने से बेहतर है, एक बार स्थायी समाधान पर गंभीरता से काम क्यों न किया जाए?”

अनुदान नहीं, अधिकार चाहिए।
राहत नहीं, स्थायी समाधान चाहिए।
सामुदायिक किचन नहीं, सुरक्षित भविष्य चाहिए।
प्लास्टिक नहीं, मजबूत वाटरवे बांध चाहिए।

— एन.के. सिंह
ग्राम एक्टिविस्ट | सरपंच, बोरना
गोगरी प्रखंड, खगड़िया, बिहार

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