"जब स्थानीय प्रशासन (BDO, DM) महीनों तक कुंभकर्णी नींद में रहे और चुनाव जीतने के बाद सांसद महोदय ज़मीनी हकीकत से दूर हो जाएं, तो अवाम की आवाज़ को सीधे देश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचाना पड़ता है।"
खगड़िया के महदा और पीरपैंती स्कूल की जर्जर हालत इस बात का प्रमाण है कि निचले स्तर पर अधिकारी कैसे सिस्टम को धोखा दे रहे हैं। इसी लापरवाही को उजागर करने के लिए, भारत के पहले 'वेब-फर्स्ट' डिजिटल सरपंच नवल किशोर सिंह ने अब एक बेहद प्रासंगिक सवाल उठाते हुए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को एक खुला खत लिखा है।
लेकिन यह खत पढ़ने से पहले, प्रधानमंत्री जी के उस वादे और दावे को याद करना ज़रूरी है, जहाँ उन्होंने विकास कार्यों की अचूक निगरानी की बात कही थी:
मई 2022 में प्रधानमंत्री मोदी का बयान, जहाँ उन्होंने ड्रोन से विकास कार्यों की अचानक निगरानी करने की बात कही थी।
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,
देश आपके 'डिजिटल इंडिया' और 'विकसित भारत 2047' के विज़न से बेहद प्रेरित है। एक ग्राम प्रतिनिधि के तौर पर मुझे यह सुनकर बहुत गर्व होता है जब आप बताते हैं कि अब 'ड्रोन' और 'सैटेलाइट' के ज़रिए दिल्ली से ही देश के कोने-कोने में चल रहे विकास कार्यों की निगरानी की जा रही है, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है।
महोदय, आपकी तकनीक और निगरानी प्रणाली अचूक होगी, लेकिन लगता है कि खगड़िया ज़िले का स्थानीय प्रशासन आपके उस हाई-टेक 'पीएमओ डैशबोर्ड' से ज़मीनी हकीकत को चालाकी से छिपा रहा है। शायद इसीलिए सैटेलाइट की नज़र खगड़िया के ग्रामीण स्कूलों पर नहीं पड़ पा रही है।
मैं आपका ध्यान विशेष रूप से बन्नी पंचायत के 'महादा प्राथमिक विद्यालय' और कोयला पंचायत के 'पीरपैंती स्कूल' की खौफनाक स्थिति की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। एक तरफ जहाँ आपके विज़न में 'पीएम श्री स्कूलों' का विश्वस्तरीय ढांचा तैयार हो रहा है, वहीं महादा स्कूल में 130 बच्चे एक ऐसे खँडहर सामुदायिक भवन में मिड-डे मील (MDM) खाने को मजबूर हैं, जो किसी भी दिन धराशायी हो सकता है। पीरपैंती स्कूल में तो जंग लगी सरिया वाली छत सीधे बच्चों के सिर पर लटक रही है।
स्थानीय प्रशासन और हमारे जनप्रतिनिधि पिछले 7 महीनों से इस जानलेवा स्थिति को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। आपके 'सैटेलाइट' और 'ड्रोन' शायद फाइलों में सब कुछ हरा-भरा दिखा रहे हों, लेकिन ज़मीन पर नौनिहालों की जान खतरे में है।
महोदय, हमारे बच्चों को अभी 'स्मार्ट क्लास' नहीं, बस एक 'सुरक्षित छत' चाहिए। आपसे विनम्र आग्रह है कि खगड़िया के इन ग्रामीण स्कूलों की ओर अपने निगरानी तंत्र (ड्रोन) का रुख करें और स्थानीय अधिकारियों की इस घोर लापरवाही पर सख्त कार्रवाई करें, ताकि किसी बड़ी दुर्घटना से पहले बच्चों की जान बचाई जा सके।
— नवल किशोर सिंह
(ग्राम एक्टिविस्ट एवं भारत के पहले 'वेब-फर्स्ट' डिजिटल सरपंच)
संघर्ष का बढ़ता दायरा (Escalation Timeline)
यह कोई रातों-रात उठा मुद्दा नहीं है। यह महीनों की उस निराशा का परिणाम है जो सिस्टम ने इन मासूम बच्चों को दी है: