"खगड़िया के ग्रामीण स्कूलों के जर्जर भवन बच्चों के लिए मौत का कुआँ बन चुके हैं। पीरपैंती स्कूल की गिरती छत हो या महादा का खँडहर MDM भवन, सिस्टम महीनों से सोया है। और इस सिस्टम से अकेले भिड़ रहे हैं ग्राम एक्टिविस्ट नवल किशोर सिंह।"
ग्रामीण स्तर पर शिक्षा के बुनियादी ढांचे और बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन का रवैया कितना उदासीन हो सकता है, खगड़िया ज़िले के विद्यालय इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। यह कोई एक पंचायत या एक स्कूल की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे ज़िले के शिक्षा तंत्र में लगे घुन की सच्चाई है।
इस प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ ग्राम एक्टिविस्ट नवल किशोर सिंह ने ग्रामीणों के साथ मिलकर एक व्यवस्थित महाभियान (Crusade) छेड़ रखा है। कोयला पंचायत के पीरपैंती स्कूल का मुद्दा उठाने के ठीक कुछ दिनों बाद ही, उन्होंने बन्नी पंचायत के महादा प्राथमिक विद्यालय के जर्जर भवन का मामला फिर से प्रशासन के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। इसे प्रमुख अखबार 'दैनिक भास्कर' ने 21 अप्रैल 2026 के अपने संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
⏱️ शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती टाइमलाइन
नवल किशोर सिंह ने पहली बार महादा स्कूल (बन्नी पंचायत) के जर्जर भवन का मुद्दा उठाया और मीडिया (भास्कर) ने इसे कवर किया। पहली रिपोर्ट यहाँ पढ़ें
नवल जी ने पीरपैंती स्कूल (कोयला पंचायत) की गिरती छत का मुद्दा X (ट्विटर) पर उठाया, और सांसद राजेश वर्मा व उपमुख्यमंत्री से सीधा सवाल किया कि "क्या बच्चों की जान की कीमत पर सुनेंगे?" विस्तृत रिपोर्ट पढ़ें
महादा स्कूल की शिकायत के 7 महीने बाद भी प्रशासन मौन। नवल किशोर सिंह ने ग्रामीणों के साथ फिर मोर्चा खोला और दैनिक भास्कर ने इस लापरवाही की ताज़ा पोल खोली।
जर्जर भवन में बन रहा एमडीएम बच्चों की सुरक्षा पर खतरा
थाना क्षेत्र के बन्नी पंचायत के वार्ड संख्या 12 स्थित प्राथमिक विद्यालय महदा में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जगह की कमी के कारण विद्यालय के बगल में स्थित जर्जर सामुदायिक भवन में मध्यान्ह भोजन (एमडीएम) तैयार किया जा रहा है और वहीं बच्चों को परोसा भी जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार भवन की स्थिति अत्यंत खराब है, जिससे कभी भी दुर्घटना होने की आशंका बनी रहती है। विद्यालय में मात्र दो वर्ग कक्ष हैं, जबकि पांच कक्षाओं का संचालन किया जाता है। कमरों की कमी के चलते पढ़ाई बरामदे पर भी करानी पड़ती है।
सैकड़ों बच्चों के नामांकन के बावजूद पर्याप्त कक्ष नहीं होने से शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो रही है। विद्यालय में न तो खेल का मैदान है और न ही बाउंड्री वॉल है, जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक चिंतित हैं।
स्थानीय सरपंच नवल किशोर सिंह सहित ग्रामीणों ने सुरक्षित स्थान पर एमडीएम की व्यवस्था करने और विद्यालय में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।
विश्लेषण: स्मार्ट सिटी के वादे और खगड़िया की जर्जर हकीकत
अगर हम देश के विकास और 'स्मार्ट सिटी' (Smart City Mission) के बड़े-बड़े विज्ञापनों को एक पल के लिए किनारे रख दें और खगड़िया ज़िले के ग्रामीण स्कूलों की ज़मीनी हकीकत देखें, तो तस्वीर डराने वाली है। कोयला पंचायत के पीरपैंती स्कूल में बच्चे जंग लगी सरियों वाली छत के नीचे बैठते हैं, जो किसी भी पल भरभरा कर गिर सकती है। वहीं, बन्नी पंचायत के महादा स्कूल में 130 बच्चों के लिए मात्र दो कमरे हैं और उनका निवाला (MDM) एक ऐसे खँडहर सामुदायिक भवन में पक रहा है, जिसकी दीवारें कभी भी दरक सकती हैं।
क्या जान जाने के बाद जागेगा प्रशासन?
सितंबर 2025 से लेकर अप्रैल 2026 तक, पूरे 7 महीने बीत जाने के बाद भी महादा स्कूल की स्थिति जस की तस है। प्रशासन गहरी नींद में है। एक तरफ स्थानीय जनप्रतिनिधि हैं जो चुनाव जीतने के बाद इन जर्जर भवनों की तरफ मुड़कर नहीं देखते, और दूसरी तरफ एक ग्राम एक्टिविस्ट है जो लगातार अवाम को जागरूक कर रहा है।
नवल किशोर सिंह ने हाल ही में X (पूर्व में ट्विटर) के माध्यम से खगड़िया के माननीय सांसद श्री राजेश वर्मा और राज्य के उपमुख्यमंत्री का ध्यान भी इस 'एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर इमरजेंसी' की ओर खींचा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि जब तक कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाए, किसी मासूम की जान न चली जाए, तब तक कोई फंड पास नहीं होगा और कोई अधिकारी स्कूल का निरीक्षण करने नहीं पहुंचेगा?
यह लड़ाई सिर्फ महदा या पीरपैंती की नहीं है। यह उन तमाम सरकारी स्कूलों की है जिन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। नवल किशोर सिंह का यह महाभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक खगड़िया के बच्चों को एक सुरक्षित और भयमुक्त शिक्षा का माहौल नहीं मिल जाता।