# सरपंच की डायरी: 10 किलोमीटर का जननिरीक्षण — जहां-जहां पहुँचा, वहाँ-वहाँ पीएचईडी की लापरवाही, अधूरी योजनाएँ और जलजमाव की हकीकत सामने आई


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**📅 दिनांक:** 28 जून 2026 (रविवार)  
**✍️ लेखक:** ग्राम एक्टिविस्ट एनके सिंह  
**सरपंच, बोरना पंचायत, गोगरी, खगड़िया (बिहार)**

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## सरपंच की डायरी | जनता के बीच बिताया एक दिन

जनप्रतिनिधि होने का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं होता, बल्कि हर दिन जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना, उन्हें अपनी आँखों से देखना और उनके समाधान के लिए प्रशासन तक आवाज़ पहुँचाना भी होता है।

**28 जून 2026 (रविवार)** का पूरा दिन भी इसी उद्देश्य के नाम रहा।

दोपहर **1:40 बजे** मैं अपने निजी आवास **बड़ी भदलय (बोरना पंचायत)** से निकला। आज का लक्ष्य केवल यात्रा करना नहीं था, बल्कि उन गांवों और वार्डों तक पहुँचना था जहाँ लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

करीब **10 किलोमीटर** की यात्रा के दौरान मैंने **झिकटिया पंचायत के छोटी भदलय, पतला गांव, रामचन्द्रपुर वार्ड संख्या-14, महेशखूंट के केशव चौक और राजधाम वार्ड संख्या-01, 02 एवं 03** का निरीक्षण किया। हर जगह लोगों से बातचीत की, उनकी बातें सुनीं और विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति देखी।

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## पहला पड़ाव : झिकटिया पंचायत की सच्चाई

लगभग **3:00 बजे** मैं **छोटी भदलय, पतला गांव एवं रामचन्द्रपुर वार्ड संख्या-14** पहुँचा।

यहाँ पहुँचते ही सबसे पहले **पीएचईडी विभाग** के कार्यों का निरीक्षण किया। जो दृश्य सामने था, उसने कई सवाल खड़े कर दिए।

कई स्थानों पर पाइप सड़क किनारे बिना किसी व्यवस्था के फेंके हुए मिले। जहाँ पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़क खोदी गई थी, वहाँ आज तक उसकी मरम्मत नहीं की गई। सड़क टूटी हुई है और ग्रामीण रोज उसी रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं।

स्थानीय लोगों ने बताया कि कई घरों तक आज भी नल-जल योजना का कनेक्शन नहीं पहुँचा है। कुछ परिवारों के नाम सूची में हैं, लेकिन उनके घरों तक पाइपलाइन ही नहीं बिछाई गई।

जब सरकारी योजनाएँ कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर पहुँचती हैं, तब उनका मूल्यांकन जनता करती है। दुर्भाग्य से यहाँ लोगों के चेहरे संतोष नहीं, बल्कि निराशा बयां कर रहे थे।

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## दूसरा पड़ाव : केशव चौक की नई नाली और पुरानी समस्या

लगभग **3:35 बजे** मैं वहाँ से राजधाम की ओर निकला।

रास्ते में **3:42 बजे** महेशखूंट के **केशव चौक** पर हाल ही में बनी नई नाली को देखने के लिए रुक गया।

निरीक्षण करते ही एक बात समझ में आ गई कि इस निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नाली की ऊँचाई सड़क से लगभग **10 से 12 इंच** अधिक दिखाई दी।

अब सवाल यह है कि यदि नाली सड़क से ऊँची होगी, तो सड़क पर जमा बारिश का पानी उसमें जाएगा कैसे?

संयोग से आज बारिश भी हुई थी। नतीजा वही रहा जिसकी आशंका थी—जलजमाव पहले की तरह बना हुआ था।

यदि निर्माण के बाद भी जनता को राहत नहीं मिलती, तो ऐसे निर्माण कार्यों का उद्देश्य क्या रह जाता है?

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## तीसरा पड़ाव : राजधाम में पेयजल संकट

इसके बाद मैं **राजधाम वार्ड संख्या-01** पहुँचा।

यहाँ स्थानीय लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि इस वार्ड में आज तक **पीएचईडी विभाग द्वारा पाइपलाइन ही नहीं बिछाई गई है।**

यानी लोग आज भी शुद्ध पेयजल से वंचित हैं।

वार्ड संख्या-02 और 03 के लोगों ने भी बताया कि वहाँ नियमित रूप से पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है।

जब सरकार की प्राथमिक योजनाओं में पेयजल सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, तब ऐसी स्थिति निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

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## एक ऐसा सवाल जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं

निरीक्षण के दौरान एक और बात ने मेरा ध्यान खींचा।

**खाड़ोधार पुलिया से लेकर महेशखूंट बस स्टैंड** तक पूरे रास्ते में मुझे **एक भी सार्वजनिक हैंडपंप** दिखाई नहीं दिया।

मैं सोचने लगा...

इस भीषण गर्मी में यदि कोई राहगीर, मजदूर, रिक्शा चालक या बुजुर्ग व्यक्ति प्यासा हो जाए, तो वह पानी कहाँ से पिए?

क्या इस पूरे मार्ग पर एक भी सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

यह कोई करोड़ों रुपये की योजना नहीं है। केवल कुछ हैंडपंप भी लोगों की बड़ी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

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## आखिर समस्या कहाँ है?

आज के निरीक्षण के बाद जो तस्वीर सामने आई, उससे यह महसूस हुआ कि कई स्थानों पर **पीएचईडी विभाग के कार्यों की निगरानी और क्रियान्वयन में गंभीर कमियाँ दिखाई देती हैं।**

स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतें कई बार की गईं, लेकिन समाधान अब तक अधूरा है।

जनता केवल योजनाओं की घोषणा नहीं चाहती, बल्कि उसका वास्तविक लाभ अपने घर तक पहुँचते हुए देखना चाहती है।

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## संघर्ष की याद

जनहित के मुद्दों—बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा—को लेकर लगातार आवाज़ उठाने वाले समाजसेवी **भरत भूषण तिवारी** की याद आज बार-बार मन में आई।

उन्होंने भी इन्हीं बुनियादी समस्याओं को जनता की आवाज़ बनाकर उठाया था।

जनहित के लिए संघर्ष करने वालों की कमी नहीं होती, लेकिन ऐसे संघर्ष आसान भी नहीं होते।

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## मेरी डायरी का एक पन्ना

कभी-कभी मैं स्वयं भी सोचता हूँ...

क्या लगातार शिकायतें करना, जनता की समस्याओं को प्रशासन तक पहुँचाना और जवाब माँगना कुछ लोगों को असुविधाजनक लगता है?

क्या बार-बार आवाज़ उठाने के कारण अधिकारी मेरी बातों को हल्के में लेने लगे हैं?

लेकिन अगले ही पल मन जवाब देता है—

> **"यदि समाजसेवा का संकल्प लिया है, तो जनता की आवाज़ बनना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।"**

मैं किसी व्यक्ति या विभाग के खिलाफ राजनीति नहीं करता।

मैं केवल पाँच बुनियादी विषयों पर लगातार आवाज़ उठाता हूँ—

- बिजली
- पानी
- सड़क
- स्वास्थ्य
- शिक्षा

क्योंकि मेरा विश्वास है कि यदि इन पाँच क्षेत्रों में सुधार होगा, तभी गाँवों का वास्तविक विकास संभव होगा।

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## समापन

आज की लगभग **10 किलोमीटर** की इस यात्रा ने एक बार फिर यह एहसास कराया कि योजनाएँ तभी सफल मानी जाएँगी जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

मेरी यह डायरी केवल एक दिन का विवरण नहीं है, बल्कि उन लोगों की आवाज़ है जो आज भी अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए इंतज़ार कर रहे हैं।

**जनता की समस्याएँ ही मेरी प्राथमिकता हैं, और उनके समाधान के लिए आवाज़ उठाना मेरा कर्तव्य भी है और मेरा संकल्प भी।**

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**✍️ ग्राम एक्टिविस्ट एनके सिंह**  
**सरपंच, बोरना पंचायत, गोगरी, खगड़िया (बिहार)**

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